Arignar Anna’s Speech (People’s Poet) Hindi Version
सन् १९४८ को उन्होंने ‘आल इंडिया रेडियो’ पर अंग्रेज़ी में जो भाषण दिया था उसका हिंदी रूप प्रस्तुत करने में मुझे महान आनंद का अनुभव हो रहा है |
लोक कवि
“लोक कवि”, एकदम आकर्षक और बड़े ही महत्वपूर्ण शब्द है, जो न केवल कवि विशेष के लिए, बल्कि सारी जनता के लिए सम्मान की बात सिद्ध हुई है | क्योंकि, यह सारी जनता ने महाराजा और सामंत, वीर योद्धा और रक्षक, धर्मगुरु और साधू संत, चमत्कार करनेवाले और पुरोहित आदि अनेकानेक महानुभूतियों को देखा था | अनादि काल से ऐसे कवियों का भी आभाव न था जो अपनी ढेर सारी रचनाओं के माध्यम से राजमहलों को अलंकृत किया करते थे | लेकिन ऐसे कवियों को उन लोगों ने शायद ही देखा होगा जो जनता के बीच में रहकर, जनता की जुबान से, जनता के लिए कवितायें रचे हों | उस ज़माने के कवियों की वाणी या तो मंदिरों की घंटियों का काम करती थी, या राजमहलों के नगाड़ों का; लेकिन लोगों के मनो विचारों का प्रतिनिधित्व कभी नहीं करती और कभी कभी करती भी तो ऐसा कर देती कि “यह सारा संसार किस प्रकार लालच से भरा हुआ है ; चाँदी का टका पाप का चिन्ह है और सोने का स्पर्श करना धर्मभ्रष्ट है |” इस प्रकार के व्याख्यान, राजदण्ड और कोड़े का काम करते थे | क्रमशः कवि लोगों ने राजमहल में और एक प्रतिष्ठित स्थान पा लिया | वह इस कोटि का पुलिस बन गया जो इस भूलोक में मुकद्दमा दर्ज कराता है और आसमान में स्थित स्वर्ग से उसका फ़ैसला होने का इंतजार करता है | उनकी भाषा आम जनता की भाषा से बिलकुल भिन्न थी | ये लोग अपने ही स्वजनों से, जिनके बीच जन्म लेकर यहाँ तक पहुँच पाए हैं, उनसे घृणा करते हैं | वे हमेशा अपनी कवित्व के बल राजमहल में अपना स्थान बना लेने का सतत प्रयास करते रहे और उसे हासिल करने के बाद, वहाँ के राजा महाराजाओं के मन बहलानेवाली रचनाएँ करते थे | ध्यान देने की बात यह है कि जब कभी राजा लोग इनकी कविता से प्रसन्न होकर, भेंट के रूप में जो सोने का आभूषण दिया करते हैं, वह सोना इनके लिए खरा है | पर संघकाल के कवि इस दयनीय स्थिति के अपवाद हैं और आज के लोग शायद ही उनसे परिचित होंगे | वे अपनी कविताओं के माध्यम से धर्म के विक्रेता और प्रसन्नता के सौदागर बन गए थे | उनकी धारणा थी कि लोक कवि बनना लाभदायक नहीं है | इसी वजह से, तमिल नाडू में संघकाल के उपरांत, एक भी महान लोक कवि को हम देख नहीं पाते |
प्राचीन काल के कवि
धर्म ऐसा एक निवेश माना जाता था जो परलोक में सुखी जीवन बिताने का काम आवे | इस गलत और घातक सिद्धांत के आगमन के बाद, कवि लोग, अपने को ऐसे बैंक विशेष का स्वनियुक्त प्रतिनिधि मानकर उसका यशोगान करने लगे | एक चतुर बैंककर्मी और सक्रीय बीमा एजेंट की भांति अपने बैंकों की स्थिरता, दिए जानेवाले अच्छे लाभांश और समृद्ध संभावनाएँ आदि विषयों पर अनगिनत कविताएँ रचने लगे | कोई कवि भगवान विष्णु के गरुड़ वाहन की शक्ति पर रमणीय कविताएँ रच देता, तो कोई सर्वेश्वर शिवजी के शानदार वाहन बैल पर | कोई कवि, सुब्रह्मन्य स्वामी के खूबसूरत मोर पर छप्पय बनाता, तो कोई मृत्यु देव यमजी के बदसूरत भैंस पर | एक कलाकार की दृष्टि से, निश्संदेह ये सभी रचनाएँ उच्च कोटि की अवश्य होती हैं | उनमें न ही सुर लयों से युक्त शब्द चयन की कमी थी, न उपमा, रूपक और दृष्टान्त आदि कलापक्ष की | उनमें एक ही विषय उपेक्षित था कि तार्किक चिंतन | इन कवियों का विचार था कि जहाँ मंदिर की घंटी ठीक ठीक काम नहीं करती वहाँ इन्हीं की रचनात्मक शक्ति का प्रयोग होता है | इसी को ही अपना कर्तव्य समझकर ये लोग, इस दिशा में भागते रहे | वे अपने को श्रेष्ठ मानते थे और आम जनता की भ्रान्ति उनको बहुत भाती थी | वे विसंगतियों से निपटारा करना और अनौचित्य को सजाने का यत्न करते रहे | संसारी मोहों से मुक्ति पाने का उपदेश देते हुए, वे लोग मानव जीवन की व्यर्थता और तुच्छता आदि का मुक्त कंठ से निंदा करते थे | जब दूरबीन का अविष्कार ही नहीं हुआ था, तब ये लोग बादलों के ऊपर का स्वर्ग और पाताल लोक का नरक आदि गंभीर धार्मिक विषयों का काल्पनिक चित्रण अपनी रचनाओं में करके लोगों को आनंद विभोर कर देते थे | इन्हें पढ़कर या सुनकर, अज्ञानी लोग आवाक खड़े रहे तो ज्ञान के धनी, बुद्धिमान लोग उन रचनाओं के कलापक्ष की आराधना करते थे न कि उनके भावपक्ष की |
लोक कवि का योगदान
लोक कवि का पात्र धारण करना उतना आसान काम नहीं है | परन्तु महाकवि भारति इस महत्वपूर्ण दायित्व को अपनाकर, लोक कवि बनने में सफल सिद्ध हुए | समुद्र रूपी नील आसमान में तैरनेवाली चाँदी सी चन्द्रमा पर, झिलमिल तारों पर, खुशबूदार सुमनों पर, नदियों पर, प्रेम और वीरता आदि विषयों पर कविताएँ लिखने मात्र से दरबारी कवि मंडल में कोई भी आसानी से अपना जगह बना लेता है | मगर लोक कवि बनकर अपनी महत्वपूर्ण दायित्व निभाने के लिए, उसे न केवल घृणा की अनेकानेक बाधाओं को पार करना और अनगिनत जोखिम उठाना पड़ता है, बल्कि उन्हें संरक्षण और प्रसिद्धि आदि बातों से वंचित रहना पड़ता है | महाकवि सुब्रह्मन्य भारती की कवित्व और उनकी कविताओं के बारे में आपके मैत्री मंडल के इने गिने लोगों को ही ज्ञात था | लेकिन काफ़ी समय के बाद भी जन साधारण को यह बात मालूम नहीं था कि एक ऐसे कवि हैं जो लोक कवि के रूप में उनके लिए आवाज दे रहे हैं | शुरू में आपका पहचान, आपकी ऐसी कविताओं के माध्यम से नहीं हुयी थीं जिसकी कल्पना और प्रस्तुति केवल लोक कवि के द्वारा ही संभव है | प्रायः राजनैतिक रंग चढ़ाये गए आपकी कविताओं के द्वारा ही आप जाने जाते थे | हमारे यहाँ कवियों की कमी कभी नहीं थी | एक उदाहरण देखिये | एक गडरिया अपना घर, कामकाज और सब कुछ भूलकर मंदिर में ही सो जाता है | मंदिर की देवता रात की अपनी पर्यवेक्षण को समाप्त करके वापस आती है | उस गरीब आदमी को देखते ही मुस्कुराती है और उसको महाकवि बनाना चाहती है | अपने हाथ के दैवी दंड से उसका स्पर्श करती है | यह सबको विदित है कि इसके आगे क्या हुआ? दैविक स्पर्श से कोई भी आदमी महाकवि बन सकता है और उसका कर्तव्य यह हो जाता है कि आमरण उस देवता विशेष पर या सभी देवताओं पर भक्ति गीतों की रचना करते रहना | यह सिद्धांत अपना जड़ इस प्रकार जमाता गया कि कोई भी आदमी लोक कवि से मिलने तैयार नहीं थे, चाहे वह स्वयं उनके सम्मुख खड़े हो जाये | यदि कोई ऐसा बोल उठे कि “मैं लोक कवि हूँ और आप लोगों में से एक होने के नाते आपके लिए और आपके बारे में कुछ गाने जा रहा हूँ”, तो लोग उसपर घृणित दृष्टि डालेंगे और न केवल उसका विश्वास करेंगे, बल्कि उसको स्वीकारेंगे भी नहीं | उसकी रचनाओं में जिस प्रकार यथार्थता का गहरा चित्रण होता जा रहा है, उसी प्रकार उसका विरोध भी बढता जायेगा | ऐसी जोख़िम भरी क्षेत्र में, बड़ी सावधानी से और सफलतापूर्वक कदम रखनेवाले लोक कवि के रूप में सुब्रह्मन्य भारती को हम देख सकते हैं |
भारती का काल
भारती का जन्म दो युगों के संक्रमण काल में हुआ था | आपके जन्मस्थान एट्टयपुरम में सामंतवादी शासन का प्रचलन था | वहाँ चारों ओर झोंपड़ियों से घिरा हुआ एक राजमहल था और सनातन जातीय लोग सत्तारूढ़ थे | उस समय सामंतवाद और सनातन समाज के बीच में से होकर, अपनी उदासीन और उपेक्षित दृष्टि लेकर, आधुनिकतावाद अपना सर ऊँचा उठा रहा था | और उसे अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था | ठीक इसी ज़माने में भारती का जन्म हुआ था | भारती स्वयं ब्राह्मण थे | सनातन धर्म और नवयुग के बीच में होनेवाले द्वंद्व युद्ध में भारती वीर योद्धा का रूप धारण करके युद्ध क्षेत्र में उतरकर लड़ने की उत्तम कल्पना किये होंगे | यदि आप सनातन धर्म के पक्ष लेते तो काफ़ी आराम से रहने का मौका उन्हें मिलता |
भारती – महानता के शिखर पर
भारती का जन्म अनेकानेक विसंगतियों से भरे इस संसार में हुआ था जहाँ उद्दंडता और विनम्रता, क्रूरता और करुणा कन्धों मिलाके चल रहे थे | एक ओर अपार शक्ति का भंडार भरा पड़ा था, तो दूसरी ओर उसे एकदम दबाकर चूर चूर करनेवाले अन्धविश्वास जैसे रुढ़िवादी सिद्धांतों की प्रचुरता | एक ओर प्रशस्त मार्ग दिखानेवाले बुद्धिजनों के ढेर सारे विचार, तो दूसरी ओर उनकी उपेक्षा करके चुपचाप बैठे रहनेवाले मूक लोगों का झुंड | एक ओर प्रचंड वीरता, तो दूसरी ओर बेकारण डर से कांपनेवाले कायर लोग | एक ओर आशा और दूसरी ओर निराशा | ऐसी परिस्थिति में पाश्चात्य कवि, जैसे बायरन और ब्रुक इधर पधारे थे, तो सिर्फ़ भारतम और भागवतम सीखने के लिए | तेजी से बढनेवाली बन्दूक की आवाज यहाँ के लोगों के कानों के लिए सुपरिचित हो गयी | भारती का जन्म विसंगति और विकलताओं से भरे ऐसे स्थान पर हुआ था जहाँ पुराने ज़माने के मंदिरों के नगाड़े चुप न थे और उनके कानों में हमेशा के लिए गूंजते रहे | उस ज़माने में इतिहास को गतिहीन होकर एक ओर चुपचाप खड़े रहना पड़ा था | उसे आगे बढाने के लिए एक विलक्षण शक्ति की आवश्यकता थी | लोक कवि बनकर इतिहास को गतिशील बनाने में भारती का ही बड़ा हाथ रहा |
भारती न केवल राष्ट्रीयता के उपासक थे बल्कि लोक कवि के रूप में समाज सुधार व पुनर्निर्माण के भोर का तारा थे | उन्हें विदेशी लोगों से नफ़रत थी और वे चाहते थे कि अपने स्वदेश को आज़ाद करें | वे यह नहीं चाहते थे की यही हमारा एकमात्र उद्देश्य है और इस उद्देश्य की प्राप्ति से हम तृप्त होकर वहीं रुक जावें | पर यह केवल शुरुआत ही है | वे यह चाहते थे कि समस्त देशवासी सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर अपने सर उठाकर जियें | उन्हें ऐसी दुनिया को देखने की महत्वाकांक्षा थी जहाँ बिलकुल नए विचारवाले नर और नारियों का समन्वय हो | भारती ने भय से पीड़ित लोगों को देखा | उन लोगों के सारे मुख मंडल में भय का गहरा छाप लगा हुआ था | दुनिया में ऐसा कोई वस्तु नहीं था जिससे वे डरते नहीं | उन्हें न केवल विदेशी लोगों से और उनके बन्दूक से भय था, बल्कि मंगल वेद मंत्रो का उच्चारण करने वाले अपने ही भाईजनों से और भूत प्रेत आदि से भी भय था |
स्वतंत्रता संग्राम
भारती का विचार था कि विदेशी सत्ता को इधर से भगा देने के बावजूद, ऐसे लोग स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर पायेंगे और जो देश ऐसे कायर लोगों से भरा हुआ है, वह देश उन्नति के शिखर पर उठकर दुनिया के सम्मुख गंभीर दृष्टि डाल नहीं सकता | इसलिए भारती अपने देशवासियों से यह चाहते थे कि वे अपने दिल और दिमाग से भय और हीन भावना आदि को भगा दें | उनकी जगह भारती ने आशा और हिम्मत को बांध दिया | आपने उन लोगों के छिपे हुए सूक्ष्म शक्ति को दर्शाने का महत्वपूर्ण काम किया और यह भी समझाया कि वे लोग किस प्रकार अपनी इस अपार शक्ति को, अपने आलसता व निद्रा, अज्ञानता व अंधविश्वास, हीन भावना और पूर्वधारणा आदि निंदनीय स्वभावों से व्यर्थ होने दिया है | भारती ने इन सभी विकारों को जड़ से उखाड़ फेंकने का दृढ़ संकल्प किया | ऐसी समस्याओं पर इस तरह की रुची, एक लोक कवि के सिवाय और कौन रख सकता है ? भारती को यह विषय अच्छी तरह ज्ञात था कि यह जन साधारण का और लोकतंत्र का युग है | वे चाहते थे कि सभी लोग स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लें | उन्होंने न ही देवताओं की स्तुति करनेवाली भक्ति गीतों की प्रचुर मात्रा में रचना की, न भूस्वामियों के गुणगान करनेवाली रचनाओं की | आपने अपनी रचनाओं में हलधारी किसान, पालने को झुलानेवाली नारी और मैदान में खेलनेवाले लड़के आदि को स्थान दिया है | जब पुराने ज़माने के कविजन, स्वतंत्रता संग्राम के लिए, पुरानी साहित्यिक रचनाओं का सहारा लिया करते थे, तो भारती उनसे भिन्न होकर, आज के युग के प्रशिद्ध और उल्लेखनीय घटनाएँ और विदेशों में संपन्न हुए स्वतंत्रता संग्राम आदि विषयों का अपनी रचनाओं में समावेश किया करते थे | उन्होंने अपनी रचनाओं में इटली के क्रांतिकार और देशभक्त मेत्सिनी के अथक प्रयास का जो फल उस देश की स्वतंत्रता के रूप में मिला था उसका चित्रण किया ; फ्रेंच क्रांति के बाद जो सुपरिणाम उन्हें मिला उसका रमणीय चित्रण अपने ही शब्दों में किया ; त्सार के पंजों से छुटकारा पाए रूस का अभिनव रूप को प्रस्तुत किया | इसी से वे तृप्त नहीं हुए | अपनी तूलिका से आजाद बेल्जियम और फ्रांस, लाल रूस और फिजी द्वीप समूह के देहाती नर आदि का सुन्दर चित्र बनाते गए | वे शेक्स्पियर की तरह नए नए चित्रों को दर्शाते गए | वही लोक कवि माना जाता है जो अपने ही स्वजनों की मूढ़ता और कमजोरियों को दर्शाने में कभी नहीं हिचकते | लोक कवि का कर्तव्य, यह भी दर्शाना होता है कि अन्य देश के लोग जिस तेज़ी से जीवन की नए पक्ष की ओर आगे बढ़ रहे हैं जबकि अपने स्वजनों के विचार और कर्म मंद गति का होता है | उन्होंने शीर्ष श्रेणी के समुदाय का जरा भी परवाह किये बिना सभी तथ्यों का जनता के सामने ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया | चूंकि पाखंडों का पर्दापाश करना लोक कवि का कर्त्तव्य होता है, इसलिए जहाँ तक संभव हो, भारती अपने इस धर्म का पालन बड़े ही साहस और उत्साहपूर्ण ढंग से किया करते थे |
रुदिवाद की निंदा
राजनैतिक क्षेत्र में ऐसे बहुत सारे नेता थे जो राजनैतिक लाभ उठाने और भारती के ‘लोक कवि’ वाले पक्ष को जन साधारण से छिपाने के लिए आपका ‘राष्ट्रकवि’ वाला बृहत् चित्र बनाते गए| आपकी कविताएँ केवल मधुर शब्दों की बनी मालाएँ न थीं | लेकिन हमारा यह लोक कवि, लोगों के रुढ़िवादी सिद्धांतों का और विचारों का कट्टर विरोध किया करते थे | ऐसे कट्टरवादी लोगों को कठोर शब्दों में पुछ उठते हैं, “हे मुर्ख ! चिरकाल से जिन विषयों को मानते आ रहे हैं, सनातनी के पृष्टभूमि पर उन्हें कब तक आँखें मूंदे मानते रहोगे?”
वर्तमान में जियें और भविष्य का निर्माण करें
क्या आपकी धारणा यह है कि पुराने ज़माने में कोई भी अज्ञानी नहीं रहे और किसी की भी खोपटी खाली नहीं रही | फिर क्यों उन्हीं के अर्थहीन विचारों पर आप अकड़े हैं ? वर्तमान में जीकर भविष्य का निर्माण करना सीखें | भारती का कहना है कि जो काल गया गुजरा है वह कभी वापस नहीं आनेवाला है और उसकी ओर ताकते रहना बेकार है | यहीं पर आपका और हमारा विचार मिलता जुलता है | भारती ने लोगों के सम्मुख ऐसा नैतिक मूल्य और नयी दृष्टी को दृढ़तापूर्वक प्रस्तुत किया जो वास्तविक व यथार्थ जीवन से तालमेल रखते हैं न कि कुछ सनातन मूल्यों की तरह जीवन से बिलकुल भिन्न होते हैं | वे यह नहीं चाहते थे कि सारी जनता माया सिद्धांत के नीचे ही दबे रहें | परिणामों का जरा भी परवाह किये बिना न केवल ऐसे सिद्धांत का बल्कि उसी सिद्धांत पर अड़े रहनेवाले आश्रमी लोगों का भी उन्होंने कठोर विरोध और व्यंग्य किये | ऐसे सिद्धांत से लिपटे लोगों को भारती अकर्मी, गतिहीन और निकम्मे आदि सज्ञा देकर संबोधित करते हैं |
आपका धर्म
भूख प्यास, दरिद्रता और अज्ञानता आदि को देखने व सुनने मात्र से भारती का खून खौलने लगता है | वे धनवानों के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं | अगर एक भी आदमी भूखा निकले तो यह सारी दुनिया को आग लगा देने की खुलकर चेतावनी भी देते हैं | वे यह चाहते थे कि सभी लोग अमन चैन से जीवन बितावें ; अपनी योग्यता बढ़ा लें ; वाणिज्य की वृद्धि कर लें ; सारे देश में औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिले और नवयुग के सभी प्रकार के लाभ सबको मिले | वे कोई भी पुरोहित या धर्मोपासक बनकर किसी भी प्रकार के मन्त्रों का उच्चारण करनेवाले धर्म के आदी न थे | मानव मात्र की सच्ची सेवा करना और व्यापक अर्थ में भाईचारा ही आपका धर्म है |
आपका अधूरा काम पूरा करें
लोक कवि के जो काम होते हैं वे सचमुच बड़े हैं | उसका कर्तव्य यह होता है कि लोगों को नयी सच्चाई से अवगत कराना, नए रास्ते पर उन्हें अग्रसर कराना और नयी तरीकों को अपनाने के लिए उन्हें सचेत करना आदि | उनके ये भी कर्तव्य होते हैं कि लोगों को ज्योतिषों के पंजों से छुटकारा दिलवाकर उन्हें खगोलविदों के पास ले जाना ; उनके दिल और दिमाग में बसे हुए रसज्ञ की जगह रसायनज्ञ को बिठाना ; पुरोहितों को भगाकर उनकी जगह अध्यापकों को ले आना और चमत्कार करनेवालों की जगह मरीजों की इलाज करनेवाले चिकित्सकों का लाना आदि | अन्धविश्वास के विरुद्ध युद्ध करके विज्ञान को पनपने का मौका दिलवाना भी लोक कवि का कर्तव्य होता है | लोग संभ्रम होकर तानाशाह को रक्षक और रक्षक को तानाशाह समझने की संभावना है | इसलिए लोक कवि का दायित्व एक क्रांतिकारी कवि के सामान और कभी कभी उससे भी कठिन होता है | भारती ने धैर्यतापुर्वक जो युद्ध लड़ा था वह अब भी समाप्त नहीं हुआ है | आप आज हमारे बीच में नहीं हैं | लेकिन चिंतन रूपी जो हथियार हमको आपने दिये हैं, वे हथियार इस युद्ध को सफलतापूर्वक समाप्त करने के लिए पर्याप्त हैं और यही लोक कवि को समर्पित किये जानेवाली उच्च कोटि की श्रद्धांजली हो सकती है | आपके सपनों को साकार करनेवाले बहुत सारे साधक जो इधर उपलब्ध हैं, वे इस युद्ध में ज़रूर सफलता हासिल करेंगे |

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