திரு.சாய் சேஷன் வேண்டுகோளுக்கிணங்க,
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“செம்மொழி என்னும் போதினிலே…!” கட்டுரையின் இந்தி மொழியாக்கம்…
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शास्त्रीय भाषा का नाम लेते ही…
डॉ. अव्वै नटराजन, पूर्व उपकुलपति, तमिल विश्वविद्यालय, तंजावूर
आज की तारीख (6, जून) की विशेषता है कि इसी दिन में ही तमिल को, “शास्त्रीय भाषा” के रूप में घोषित किया गया था |
इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप छोड़नेवाले महान इतिहासकार श्री जॉर्ज आर्ट के स्वर्णिम शब्दों को देखिये | “हालाँकि मैं अंग्रेज़ी भाषी अमेरिका के प्राध्यापक हूँ, पर मैंने होवार्ड विश्वविद्यालय से संस्कृत की डिग्री हासिल की | लैटिन, ग्रीक जैसी शास्त्रीय भाषाओँ का भी गहन अध्ययन किया | चूँकि मैंने पूर्वी एशियाई भाषाओँ के विभाग में काम किया था, इसलिए भारतीय भाषाएँ और अन्य एशियाई भाषाओँ की साहित्यिक विशेषताओं की भी अच्छी जानकारी मुझे प्राप्त है | बहु भाषी प्रतिभा की पृष्टभूमि पर शास्त्रीय भाषा की कसौटी पर कसने की क्षमता भी मुझे प्राप्त है | मैं दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि साहित्यों से समृद्ध भाषाओँ में तमिल भाषा का अपना विशेष स्थान है | भारत गरिमामय देश है | तमिल भाषा को शास्त्रीय भाषा के रूप में मनाने की बात को लेना, सर्वव्यापी हिन्दू धर्म को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धर्मों में एक मानने की बात लेने के सामान है |”
शास्त्रीय भाषा के लिए भारत सरकार के द्वारा तय किये गए मानकों के अनुसार वही शास्त्रीय भाषा हो सकती है जो 1500 से 2000 सालों की पुरानी हो, ऐतिहासिक विशेषता रखती हो, सम्पूर्ण व्याकरण से सुघटित और साहित्यों से समृद्ध हो | उपर्युक्त सभी लक्षणों से विभूषित तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और ओडिसी आदि 6 भाषाओं को शास्त्रीय भाषा की मान्यता भारत सरकार के द्वारा दी गयी है |
केन्द्रीय सरकार ने 12-10-2004 को तमिल भाषा को शास्त्रीय भाषा की मान्यता देनेवाली आदेश ज़ारी की | पंद्रह साल पहले इसी शुभ दिन के शुभ अवसर पर, संसद के संयुक्त सभा में भारत के राष्ट्रपति माननीय डॉ ए.पी.जे. अब्दुल कलम ने यह ऐलान किया था कि “आगे, शास्त्रीय भाषा के रूप में अपनी सुनहरे किरणों को फैलाकर तमिल और भी चकाचौंध करके अपनी चमत्कार दिखाएगी” | आपकी ये बातें दुनिया भर के तमिल विशेषज्ञ, हितैषी, तमिल भाषी लोग तमिलनाडु सरकार और अन्य प्रशासन जहाँ तमिल निवास करते हैं, को इतनी भायीं कि इसका बयान करना नामुमकिन है | इसके बाद शास्त्रीय तमिल अनुसन्धान अनुभाग तमिलनाडु के चेन्नई में खोला गया जो पहले मैसूर में था |
शुरू में, भारतीय भाषा संस्थान के मुख्यालय, भारत के इने गिने राज्यों की राजधानियों में थे | दक्षिणी भाषाओँ पर शोध करनेवाले केंद्र के रूप में मैसूर का संस्थान कार्यरत था |
इस संस्थान में भाषा विज्ञान के विषय पर शोध कार्य चल रहे थे | उनमें तमिल भाषा की रुचि, समृद्ध तमिल साहित्य आदि का नामोनिशान नहीं था | केंद्र सरकार ने बिना शास्त्रीय भाषा के सही तात्पर्य को समझे ही, इस बृहत् कार्य को मैसूर संस्थान के तमिल अनुभाग को सौंप दिया था | मैसूर के इस शाखा को शास्त्रीय भाषा के लिए जिस राशी का आबंटन किया गया था, वास्तव में वह सबको हैरान कर दिया | यहीं पर शुरू हुई थी शास्त्रीय भाषा की बेढंगी यात्रा |
लगभग इसके चार बैठक, तमिलनाडु के शास्त्रीय भाषा संस्थान की ओर से मैसूर में सुसंपन्न हुईं | चूँकि तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कलैज्ञर करुणानिधि ने आग्रह किया था कि यह संस्थान तमिलनाडु की राजधानी पर होनी चाहिए, इसलिए उन्होंने मैसूर के एक अनुभाग को चेन्नई भेजा और एक नए संस्थान खोलने का अनुरोध किया |
इस तरह की सैद्धांतिक त्रुटियों के साथ घटित भारतीय भाषा संस्थान की इस शाखा में भाषा वैज्ञानिक ही ज्यादा भाग लिए और अनुसन्धान कार्य भी शुरू हुए | तमिलनाडु सरकार ने इस तरह की गतिविधियों को रोकने का प्रयास किया | लेकिन तमिलनाडु सरकार को पूरा अधिकार देने में बाधा बनकर खड़ी रही थी केंद्र सरकार |
शास्त्रीय भाषा के गौरव को मनाने के उद्देश्य से, कोयम्बत्तूर में 500 करोड़ की खर्च पर, विश्व तमिल सम्मलेन के स्तर का एक बड़ा सम्मलेन का आयोजन हुआ, जो तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कलैज्ञर करुणानिधि के कठिन परिश्रम, आपकी दृढ़ता, तमिल भाषा के प्रति आपके प्रेम के सव्य्साक्षी बना था | भारत के राष्ट्रपति महोदय भी इस सम्मलेन पर पधारे थे और मुक्त खंड से इसका अभिनन्दन भी किया था | तमिल के श्रेष्ठ विद्वानों को पुरस्कार देकर सम्मानित करने के उद्देश्य से श्री कलैज्ञर करुणानिधि ने अपने हाथों के एक करोड़ रुपये दिए थे | वह फ़ाइल भी दिल्ली और चेन्नई को चक्कर काटता रहा और कहीं जाकर अटक गया |
केन्द्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान, केंद्र सरकार की एक स्वायत्त संस्थान है | काफ़ी इंतजार के बाद तमिल लोगों को यह संस्थान मिला है | तमिल विद्वानों के ख्वाब अनेक हैं | अनुसन्धान के क्षेत्र भी व्यापक है | महाकवि भारती ने तमिल भाषा के प्रति अटूट प्रेम और अक्षुण्ण देश भक्ति आदि को एक सूत्र में बंधकर शास्त्रीय भाषा अनुसन्धान संस्थान की नींव डाली थी | सतत प्रयत्न करनेवाले तमिल विद्वतजन और प्रशासन पर अमुख दल का छाप लगाना कहाँ तक न्याय है |
बिना माँ के बेचारे बच्चे की तरह, हर रोज, तरह तरह की समस्याओं से जूझती हमारी करुण क्रंदन भी दिल्ली के कानों तक कभी पहुँच नहीं पाती | दुसरे राज्यों की राजधानी में स्थित कोई संस्थान को इस तरह की तिरस्कार से किसी भी प्रकार का दुःख का अहसास नहीं हुआ है |
एक विश्वविद्यालय के उपकुलपति, एक मशहूर महाविद्यालय के अध्यक्ष और एक अच्छे ज्ञाता को इस संस्थान के उपाध्यक्ष बनाने के बावजूद यहाँ की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया | उपाध्यक्ष महोदय को अडैयार IIT के अध्यक्ष के समकक्ष का अधिकार दिलाना था न? मानव संसाधन विभाग के मंत्री महोदय श्री रमेश पोखरियाल देश के सुप्रसिद्ध कवि हैं | आपने उत्तरखांड राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में भी सेवा की है | सबकी धारणा है कि कविजनों को ही भाषा की महानता का बोध होता है | इस शुभावसर का लाभ उठाने का श्रेय तमिलनाडु राज्य सरकार और सांसदों का होता है |
हमारी इच्छा है कि यह संस्थान एक समृद्ध संस्थान के रूप में विकसित हो | इस संस्थान को एक विश्वविद्यालय बनाने के उद्देश्य से उचित स्थान का आबंटन किया गया है और उसपर बड़े बड़े इमारतों का निर्माण कार्य भी चालू है | उल्लेखनीय है कि इस केन्द्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान के लिए तमिलनाडु सरकार के तमिल विकास विभाग के द्वारा चेन्नई के पेरुम्पाक्कम मैं 17 एकड़ की ज़मीन का आबंटन हुआ है | “शास्त्रीय भाषा का नाम लेते ही हमारे कानों में गूंजती करुण क्रंदन”-वाले चिंतन में बदलाव लाना ज़रूरी है | ऐसे दिन की इंतजार है कि ‘शास्त्रीय भाषा दिवस’ को पूरे तमिल लोग हर्षोल्लास के साथ मनाएं |

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